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द्वार

मंदिरों में तीन ;1द्ध मुख्य द्वार ;2द्ध प्रवेश द्वार ;3द्ध गर्भ द्वार उसी तरह बनाये जाते हैं। जैसे समवशरण में तीन कोट होते हैं तथा तीनों लोकों के समान भगवान विराजमान किये जाते है। मानो तीनों लोकों को पार करने पर परमात्मा लोक के दर्शन होते है।

गर्भगृह

प्रवक्षिणा का अर्थ है कि जीवन की उत्कृष्ट साधना का फल प्राप्त करना। जैन आचार्यों ने इसे मन, वचन, काय का समर्पण माना है अथवा सम्यक्दर्शन, सम्यक्ज्ञान और सम्यक्चारित्र को प्राप्त करने का लक्ष्य रखा है। तीन लोक में परिभ्रमण करने के बाद देव, शास्त्र, गुरू को ही शरण माना है। अतः देव दर्शन गुरू वंदना के समय तीन प्रदक्षिणा दी जाती है।

हमारा जीवन मंदिर की तरह है आत्मा की वीतराग अवस्था ही देवत्व है, हम सभी में वह देवत्व शक्ति विद्यमान है, अपनी इस देवत्व शक्ति को पहचान कर उसे अपने भीतर प्रकट करने के लिए हमने बाहर मंदिर बनाये है और उनमें अपने आदर्श वीतराग, अरहंत और सिद्ध परमात्मा को स्थापित किया है। गुंबज से टकराकर विशाल घण्टों की ओम कार की ध्वनि, घण्टे का धीमा धीमा नाच, अभिषेक और पूजा के भाव भिन्न-भिन्न स्वर सभी में वातावरण को पवित्र बनाने की सामथ्र्य छिपी है। मंदिर आत्मप्रवेश का द्वारा खोल पाता है। मन्दिर में विराजित भगवान की वीतराग छवी को देखकर अपने रागद्वेष के बन्धन को क्षणभर के लिए छिन्न-भिन्न कर देना और अहंकार को गलाकर अपने आत्म-स्वरूप में लीन होने के लिए स्वयं भगवान के चरणों में समर्पित करते जाना ही जिन मन्दिर की उपलब्धि है।

छत्र

तीर्थंकर मूर्तियों तथा जिन प्रतिमाओं को एक छत्र या त्रिछत्र के नीचे पद्मासन में ध्यानलीन दर्शाने की परंपरा प्रथम शती ईसापूर्व से विद्यमान है। जैन मान्यता के अनुसार तीन लोक का स्वरूप पुरूषाकार है। उत्कृष्ट चैड़ा भाग नीेचे 7 राजू है, ऊपर 5 राजू है और सबसे ऊपर एक राजू है। अतः तीन लोक के अनुसार छत्रों के नियोजन के अनुपात में सबसे नीचे सबसे बड़ा फिर उसके ऊपर उससे छोटा और सबसे ऊपर और भी छोटा छत्र लगाना होता है।

मान स्तम्भ का महात्मय

जैनागम के अनुसार जब भगवान का साक्षात समवशरण लगता है तब चारों दिशाओं में चार मान स्तंभ स्थापित किये जाते है। मान स्तंभ के चारों दिशाओं में एक एक प्रतिमा स्थापित की जाती है। अर्थात् एक मान स्तम्भ में कुल चार प्रतिमायें होती हैं। इस मान स्तम्भ को देखकर मिथ्या दृष्टियों का मद ;अहंकारद्ध गल जाता है और भव्य जीव सम्यग्दृष्टि होकर समवसरण में प्रवेश कर साक्षात् अरिहंत भगवान की वाणी को सुनने का अधिकारी बन जाता है।

भारतीय स्थापत्य या वास्तु का अपरिहार्य अंग है स्तम्भ। जिसे मान स्तम्भ कीर्तिस्तम्भ से अभिहित किया गया है। मंदिर, स्तूप और जैन तीर्थंकरों के उपदेश सभा समवशरण में स्तम्भ अनिवार्य रूप से बनाये जाते थें। मानस्तम्भ आज भी लोकप्रिय है मान स्तम्भ पर तीर्थंकर प्रतिमाएॅं सुशोभित है।

पंचपरमेष्ठी

फोटो

अरहंत, सिद्ध आचार्य, उपाध्याय साधु

अन्तिम केवली
श्रुत केवली
दशपूर्वी
एकादशगंगाधारी
आचारांगधारी
चार आरातीय यतियों
एक अंगधारी
आचार्य : श्रुतधराचार्य, सारस्वताचार्य, प्रबुद्धाचार्य, परंपराकोषकाचार्य, आचार्यतुल्य कवि लेखक
आचार्यकल्प
बालाचार्य
ऐलाचार्य 
उपाध्याय
मुनि
ऐलक
क्षुल्लक
ब्रह्मचारी, ब्रती-सात प्रतिमाधारी
गणिनी आर्यिका भट्टारक परंपरा
आर्यिका
क्षुल्लिका, ब्रह्मचारिणी
दिगम्बर जैन जातियाॅं ;कुल-गोत्रद्ध

महावीर स्वामी के निर्वाण के पश्चात् तीर्थंकर-परम्परा समाप्त हो गई थी। तत्पश्चात् गणघरों ने जैन संघ को नेतृत्व प्रदान किया और केवली, श्रुतकेवली एवं अगंधारी होते रहें। इस आचार्य परम्परा ने महावीर स्वामी के पश्चात् 643 वर्षों तक अपने पारलौकिक ज्ञान से इसे आगे बढ़ाया।

विक्रम संवत् की प्रथम सदी में आचार्य गुणधर ने श्रुत का विनाश हो जाने के भय से कषायपाहुड़ नामक महत्वपूर्ण सिद्धांत ग्रन्थ प्राकृत गाथाओं में निबद्ध किया। इसी युग में आचार्य कुन्दकुन्द को जिन्होंने चैरासी पाहुड़ ग्रन्थों की प्राकृत भाषा में रचना कर मुख्य स्थान प्राप्त किया।

आचार्य कुन्दकुन्द के पश्चात् आचार्य गृद्धपिच्छ, उमास्वामी, समंतभद्र, सिद्धसेन, देवनन्दि, पात्रकेसरी आदि पचासों आचार्य एक के बाद दूसरे होते गये तथा धर्म व संस्कृति को अपने ज्ञान से पल्लवित करते रहे। सातवीं शताब्दी में अकलंक नाम के आचार्य बहुत प्रसिद्ध हुये। ये जैनन्याय के प्रतिष्ठाता थे तथा प्रकाण्ड पंडित, धुरंधर शास्त्रार्थी और उत्कृष्ठ विचारक थे। इसी परम्परा में नवीं सदी में आचार्य जिनसेन हुए। जिन्होंने हरिवंशपुराण नामक ग्रंथ की रचना की। इसके पश्चात् वीरसेन के शिष्य जिनसेनाचार्य व उनके शिष्य गुणभद्राचार्य ने महापुराण के लेखन का कार्य पूरा किया। नवीं शताब्दी में महावीराचार्य ने गणित सार की अभूतपूर्व रचना की। इस प्रकार प्रमुख आचार्य अणुक्रमणिका के अनुसार 13वीं शताब्दी तक 122 प्रभावशाली आचार्य हुये।

इसके पश्चात् अपंभ्रश-काल आरम्भ हुआ और जोइन्दु, स्वयंभू, पुष्पदंत, वीर, नयनन्दि, एवं रहघू जैसे कवि हुये, जिन्हांेने अपभ्रंश-साहित्य का प्रणयन करके जनसामान्य की बोलचाल की भाषा में काव्य, पुराण एवं चारित्र-प्रधान साहित्य उपलब्ध कराया।

महावीर स्वामी की शिष्य परम्परा के तीनों केवली भगवन्तों ने जगत् को महावीर के सदृश्य केवलज्ञान प्राप्त कर उपदेशामृत का पान कराया।

तीन केवल ज्ञानधारी 1. गौतम स्वामी 2. सुधर्म स्वामी 3. जम्बूस्व

1. गौतम स्वामी – ;अन्तिम केवलीद्ध केवली काल-12 वर्ष

2. लोहार्य ;सुधर्म स्वामीद्ध – ;अन्तिम केवलीद्ध केवली काल12 वर्ष

3. जम्बू स्वामी – ;अन्तिम केवलीद्ध

5. श्रुतकेवली ;100 वर्षद्ध पांच श्रुतकेवली आचार्य केवलज्ञान के स्थान पर पूर्ण श्रुतज्ञान ही प्राप्त कर सकें।

1. विष्णु नन्दि ; 14 वर्षद्ध 3. अपराजित ;22 वर्षद्ध 5. भद्रवाहु स्वामी ; 29 वर्षद्ध 2. नन्दिमित्र ; 16 वर्षद्ध 4. गोवर्धनाचार्य ; 19 वर्षद्ध

11. पूर्वधारी आचार्य ; 183 वर्षद्धइस काल में 11 आचार्य हुये जो ग्यारह अंग और दसपूर्वधारी आगमवेत्ता थे और आगम शास्त्रों के अधिकांश भाग के ज्ञाता रहें।

1. विशाखाचार्य;10 वर्षद्ध 5. नागसेनाचार्य;18 वर्षद्ध 9. बृद्धिलिंगाचार्य ;20 वर्षद्ध 2. प्रोष्ठिलाचार्य;19 वर्षद्ध 6. सिद्धर्थाचार्य ;17 वर्षद्ध 10. देवाचार्य ;14 वर्षद्ध 3. क्षत्रियाचार्य ;17 वर्षद्ध 7. घृतिसेनाचार्य;18 वर्षद्ध 11. धर्मसेनाचार्य ;16 वर्षद्ध 4. जयसेनाचार्य;21 वर्षद्ध 8. विजयाचार्य ;13 वर्षद्ध

5. एकादशांगधारी ;62 वर्षद्ध इस अवधि में पांच आचार्य केवल ग्यारह अंगों के ज्ञाता ही रहें।

1. नक्षत्राचार्य ;18 वर्षद्ध 3. पाण्डवाचार्य ;39 वर्षद्ध 5. कंसाचार्य ;32 वर्षद्ध 2. जयपालाचार्य ;20 वर्षद्ध 4. ध्रुवसेनाचार्य ;14 वर्षद्ध

4. आचारांगधारी ;97 वर्षद्ध

1. सुभद्रचार्य ;6 वर्षद्ध 3. भ्रदबाहुद्वितीय ;23 वर्षद्ध 2. यशोभद्राचार्य ;18 वर्षद्ध 4. लोहाचार्य ;50 वर्षद्ध

अंतिम श्रुतकेवली आचार्य भद्रबाहु के पुनीत चरण,अतिशय क्षेत्र श्रवणबेलगोला।

4. आरातीय यतियाॅं 1. विनयधर 2. श्री दत्त 3. शिवदत्त 4. अर्हद्दत्त

5. एक अंगधारी 1. अर्हब्दलि;28 वर्षद्ध 3. धरसेनाचार्य;19 वर्षद्ध 5. भूतवली ;20 वर्षद्ध 2. माघनन्दि;21 वर्षद्ध 4. पुष्पदंत जी;30 वर्षद्ध

गिरनार में गुरू धरसेनाचार्य से पुष्पदंत, भूतवली आचार्य विद्याभ्यास कर रहे हैं।

दिगम्बर-आरातीय-आचार्य- परम्परा को पांच भागों में विभक्त किया गया है।

1. श्रुतधराचार्य 2. सारस्वताचार्य 3. प्रबुद्धाचार्य 4. परंपराकोषाकाचार्य 5. आचार्यतुल्य कवि लेखक

1. श्रुतधराचार्य

श्रुतधराचार्य से अभिप्राय उन आचार्यों से है जिन्हांेने सिद्धांत-साहित्य-कर्मसाहित्य-अध्यात्मसाहित्य का ग्रंथन दिगम्बर आचार्यों के चारित्र और गुणों का निर्वाह करते हुए किया है। श्रुत की ये परम्परा अर्थश्रुत और द्रव्यश्रुत के रूप में ईशापूर्व की शताब्दियों से आरम्भ होकर चतुर्थ पंचम शताब्दी तक चलती रही है।

2. सारस्वताचार्य

सारस्वताचार्यों से अभिप्राय उन आचार्यों से है जिन्होंने से प्राप्त हुई श्रुत परम्परा का मौलिक ग्रन्थप्रणयन और टीका-साहित्य द्वारा प्रचार और प्रसार किया है। इन आचार्यों में मौलिक प्रतिमा तो रही है पर श्रुतधरों के समान अंग और पूर्व साहित्य का ज्ञान नहीं रहा है।

3. प्रबुद्धाचार्य

प्रबुद्धाचार्य से हमारा अभिप्राय ऐसे आचार्यों से है जिन्होंने अपनी प्रतिभा द्वारा ग्रन्थप्रणयन के साथ विवृतियाॅं और भाष्य रचे है। इन आचार्यों ने पदयात्रा द्वारा भारत का भ्रमण किया और प्राकृत, अपभ्रंश एवं संस्कृत भाषाओं में ग्रन्थ की।